मध्यवर्गीय सपने
सपनों के खूटों से टंगी ज़िन्दगी
मेरा ही गला घोटती है
और रोज मैं मरता हूँ धीमी मौत |
बगल में मेरे पलंग पर
अनगिनत सपने पड़े हैं
मरणासन्न
अपनी -अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं
जीवित हो उठने के लिए
और जब -
उन सपनों के साथ मैं
खूटें से लटकता हूँ
बारी -बारी
तो बाहर आ गयी आँखों से
मुझे दिखती है
दीवार पर टंगी हुई
फूल मालाओं से सुसज्जित
मेरी ही एक
तस्वीर |
सपनों के खूटों से टंगी ज़िन्दगी
मेरा ही गला घोटती है
और रोज मैं मरता हूँ धीमी मौत |
बगल में मेरे पलंग पर
अनगिनत सपने पड़े हैं
मरणासन्न
अपनी -अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं
जीवित हो उठने के लिए
और जब -
उन सपनों के साथ मैं
खूटें से लटकता हूँ
बारी -बारी
तो बाहर आ गयी आँखों से
मुझे दिखती है
दीवार पर टंगी हुई
फूल मालाओं से सुसज्जित
मेरी ही एक
तस्वीर |
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