प्रेमपत्र
आज तुम याद आ रही हो बहुत
इसलिए नहीं कि मैं आज बहुत अकेलापन महसूस कर रहा हूँ
बल्कि इसलिए कि तुम रोज ही याद आती हो बहुत
बस आज कह पा रहा हूँ
ये कहने से पहले भी
एक बार मैंने पूछा था खुद से
कि कहूँ या न कहूँ ?
क्या कह देने मात्र से मेरा प्रेम परिभाषित हो पाएगा ?
क्योंकि मुझे डर है कि
जो कहा गया है
और जो सुना गया है
कहीं उसमे कोई फर्क तो न होगा?
शायद इसीलिए
जो कुछ भी है तुम्हारे लिए
वह बीस हर्ट्ज़ से ज्यादा न हो पाया था अब तक
लेकिन उसका कम्पन मुझसे अब बर्दाश्त न हो पाया
बेशक यहाँ मैं स्वार्थी हो गया
पर हिम्मत करके एक बार फिर
कहूँगा कि-
आज तुम याद आ रही हो बहुत
और तब तक कहता रहूँगा
जब तक मुझे लगेगा नहीं कि
जो कहा गया है
वही सुना गया है |
आज तुम याद आ रही हो बहुत
इसलिए नहीं कि मैं आज बहुत अकेलापन महसूस कर रहा हूँ
बल्कि इसलिए कि तुम रोज ही याद आती हो बहुत
बस आज कह पा रहा हूँ
ये कहने से पहले भी
एक बार मैंने पूछा था खुद से
कि कहूँ या न कहूँ ?
क्या कह देने मात्र से मेरा प्रेम परिभाषित हो पाएगा ?
क्योंकि मुझे डर है कि
जो कहा गया है
और जो सुना गया है
कहीं उसमे कोई फर्क तो न होगा?
शायद इसीलिए
जो कुछ भी है तुम्हारे लिए
वह बीस हर्ट्ज़ से ज्यादा न हो पाया था अब तक
लेकिन उसका कम्पन मुझसे अब बर्दाश्त न हो पाया
बेशक यहाँ मैं स्वार्थी हो गया
पर हिम्मत करके एक बार फिर
कहूँगा कि-
आज तुम याद आ रही हो बहुत
और तब तक कहता रहूँगा
जब तक मुझे लगेगा नहीं कि
जो कहा गया है
वही सुना गया है |
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