माँ के दोस्त

जबसे मैं जानने-समझने लायक हुआ
उनके ज्यादातर दोस्त उनकी ही तरह
रसोईघर में कैद थे

उनमे से उनका सबसे करीबी था
एक हल्दी का डिब्बा जो मुझसे पुराना था
इतना पुराना कि वो उसे अपने बचपन से जानती थी
वो हल्दी जो किसी घाव पर मरहम सी लग जाती थी

मैंने भी अपने बचपन में एक बार अपनी दादी के साथ
हल्दी को जमीन से खोदकर निकाला था
जिससे उसे पीसने के बाद काम में लिया जा सके
तब मुझे लगा था कि उन्हें पिसना न पड़े इसलिए
वो जमीन के अंदर छिप जाती हैं
पर मेरी माँ नही छिप सकती थी
उसे तो कोख से निकलते ही काम पर लगा दिया गया था
हल्दी को तो बड़ा होने पर खोदते हैं
उसको खाद-पानी देकर बड़ा करते हैं
तभी काम पर लगाते हैं ।

मेरी माँ भाग्य वगैरह मानती है
पता नही उसने कभी सोचा या नही कि
हल्दी का भाग्य उससे अच्छा कैसे हो सकता है!

खैर जब वो अठरह की हुई
उसको सश्रम कारावास की सजा हुई
मुझे लगता है हल्दी वाली रस्म इसीलिए है
कि इतनी भारी चोट पर उसे चढ़ाया जा सके
इतनी भारी चोट!
कि पूरा का पूरा शरीर!
मन का तो पता ही नही पर
उस पर हल्दी नही चढ़ा सकते
इसलिए उसे वहीं मार दिया जाता है।

उसको जुर्म की सजा हुई
पर उसने अपना जुर्म कभी कबूला नही
उसका मानना था कि उसने कोई जुर्म किया ही नही
पर जुर्म था किसका और सजा कौन भुगत रहा है!

रसोईघर में हल्दी के डिब्बे की दोस्ती नमक के डिब्बे से हुई
हल्दी-नमक तो खैर दो अलग प्रकृति के हैं
इस मायने में कि एक को घाव पर लगा सकते हैं
और एक को बिल्कुल भी नही
जब खाने में नमक कम होता है
और थाली पटकी जाती है
तब कम हुआ नमक ही मानो
घाव पर मल दिया जाता है।
लेकिन कोई खाना इनके बगैर पकता नही
जीवन से हल्दी-नमक नाम का यौगिक कभी जाता नही

जी हाँ हल्दी-नमक मिश्रण लगता है पर है नही
वो एक यौगिक है
बस हमें हल्दी-नमक का अनुपात पता होना चाहिए

जब घाव ही नही रहेगा
न हल्दी की जरूरत न ही नमक की
जब तक खाने में पर्याप्त हल्दी-नमक है
शारीरिक घाव से तो बचा जा सकता है।

पापा के दूसरे शहर में ट्रांसफर के बाद
उनकी गुड़ के डिब्बे से अच्छी दोस्ती हुई
इसी दौरान मुझे कई सुरंगों का पता चला
जो मेरे रसोईघर से होकर पड़ोस के एक घर की रसोईघर तक जाती थी
और इसी तरह एक रसोईघर से दूसरे रसोईघर
सब कारावसों के रसोईघर गुड़ के माध्यम से जुड़ चुके थे जहाँ सब कारावसों की माँ-बहनें चींटियों की भाँति आवागमन करती रहीं।
ये कारावसों के सभी कैदियों के हित में था।
अब चुनौती ये थी कि गुड़ के डिब्बे रसोईघर से निकाल कर कारावसों के दूसरे कमरों में रखे जाएँ ताकि कारावसों के ढेर सारे चीटों को चींटियों के मार्च में शामिल किया जा सके।
प्रशान्त

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