तुम क्या सोच रही
हो?
मैं जानना चाहता हूँ
की तुम्हारे मन में क्या चलता रहता है ?
क्या सचमुच ?
पर मेरा मन तो
तुम्हारे मन के सामानांतर चलता रहता है
मैं उसके भीतर कैसे
आऊंगा ?
मैंने अपना मन उसके
मन की तरफ मोड़ा
उसके मन में –
सुदूर तक फैला रेगिस्तान
हजारों की संख्या में ऊँट दौड़ रहे
हैं
एक तरफ एक कोने में
एक छोटी बच्ची रेत से घर बना रही है
पर बना नहीं पाती |
बहुत दूर तक चले
जाने पर
( प्रतीत हुआ कि-
दूर से ही एक बूढी
औरत मुझे घूर रही है )
बिलकुल सूखाग्रस्त
इलाका
एकदम बंजर
कहीं कहीं बबूल के
पेड़
कहीं नागफनी
उसकी काँटों पर
रविरश्मि
देखने भर से ही लगता
जैसे गरम सुई चुभोई
गयी हो
मैं दौड़ रहा दर-बदर
पसीने से लथपथ
विश्वास न होता कि
यह तुम्हारा मन है !
नहीं,यह हो ही नहीं
सकता
अकस्मात् –
एक गड्ढा सा दिखा
कहीं दूर
उसमे-
कुछ सीढियां
गुफा
की
तरफ
जाती
हुई
पर लगता है यह सुरंग
बंद हो गयी है
अँधेरा बढ़ता जाता
धीरे-धीरे घसीटता वह
अपने गुरुत्व में
मैं,जैसे उसमे समां
गया
उफ्फ
क्या मैंने ‘ब्लैक
होल’ की खोज कर ली है !
अचानक दृश्य बदला
हर तरफ सबकुछ
हरा-भरा
अजीबोगरीब पेड़-पौधे
जो मैंने देखे नहीं
कभी
क्या यह स्वर्ग जैसा
है कुछ ?
जैसा मैंने मेरी माँ
से कहानियों में सुना था ?
या स्वर्ग की
अवधारणा उनके ही मन की उपज थी?
या
स्वर्ग वाली कहानी
उन्होंने भी किसी से सुनी थी?
पर अब सुनी सुनाई
बाते
अर्थहीन |
सब-कुछ तो मैं
साक्षात् देख पा रहा हूँ
और वही छोटी सी
बच्ची जो
रेत से घर नहीं बना
पा रही थी
उसने यहाँ पानी से
घर बना लिया है |
मैंने उससे पूछा कि-
क्या मुझे इसमें एक
कमरा मिलेगा ?
वह बोली पूरा घर
तुम्हारा ही तो है |
मैं निशब्द हो गया
वह हँसते हुए भाग
गयी |
मैं पीछा करते हुए
भागा उसकी तरफ
पूछा की तुम यहाँ
कैसे आई?
उसने बोला –
कहीं से नहीं आई
मैं तो यहीं रहती
हूँ |
पर तुम तो वहाँ थी न
?
रेगिस्तान में
हाँ थी तो पर उस
वक़्त तुम भी वहाँ थे |
तो तुम भी उसी
गुफा से आई यहाँ ?
उसने कहा –
मुझे खुद तक पहुँचने के लिए किसी गुफा की जरूरत
नहीं |
मैं स्तब्ध रह गया
लकवा सा मार गया
मुझे बताओ मैं यहाँ
से वापस कैसे जाऊ?
हस कर
बोली वह कहाँ जाओगे?
वहीँ जहाँ
से आये थे ?
और वो भी मुझे यूँ
अकेला छोड़कर ?
नहीं तुम भी चलो
मेरे साथ |
वह कहती रही कि-
तुम यहीं रुक जाओ
एक बार जा चुके हो
तुम
अबकी रुक जाओ
मैंने पूछा –
क्या तुम यहाँ अकेली
रहती हो?
हाँ,एकदम अकेली
क्यों? तुम्हारी माँ
कहाँ है ?
पता नहीं |
पर एक बार मुझे उसने
बताया कि-
कोई उन्हें भी ऐसे ही
छोड़कर चला गया था |
मैं फिर से आने का
वादा करके चल दिया
उसकी मुस्कुराहट से
मुझे पता चला कि-
मेरा वादा झूठा है |
और मैं
ढूंढते-ढूँढते जा पंहुचा उस गुफा के द्वार पर
अबकी उसके गुरुत्व
ने घसीटकर
मुझे जा फेंका
उस बूढी औरत के पास
जो मुझे
बंजर-सूखाग्रस्त इलाके में घूर रही थी |
पर दृश्य अबकी
बिलकुल भिन्न था
यह बिलकुल एकांत
समतल मैदान था
उसमे फसले लहलहा रही
थी |
वह एक ओर कुर्सी पर
आराम कर रहीं थी
बिलकुल मेरी माँ की
तरह
उसने मुझे पास बुला
कर पूछा कि-
हुक्का पियोगे ?
मैं हैरान था
फिर उसने हुक्का
मेरी तरफ बढ़ा दिया
मैंने हुक्का लिया
विचार दिमाग में
उत्पन्न होकर
फेफड़े तक पहुचे
फिर धुए के साथ
निकलकर
हवा में तैरने लगे |
मैंने बोला –
क्या ऐसी कोई
रासायनिक प्रक्रिया है
जिससे इन विचारों को
धुए से पृथक किया जा सके ?
वृद्धा ने पूछा कि –
विचारों को पृथक
करके तुम क्या करोगे ?
खुद के ही विचारों
पर विचार करोगे ?
मैंने बोला शायद
‘हाँ’
पर यह विचार आप तक
पहुँचाने हो तो ?
उसने कहा मैंने धुए
के साथ ही विचारों को सूंघ लिया है |
उसके बाद उन से ‘अनंत’
की अवधारणा पर बातें हुई
उन्होंने मुझे
समझाया कि कैसे
‘प्लस इनफिनिटी’ और
‘माइनस इनफिनिटी’
एक ही चीज़ हैं |
और बताया कि-
दूरदर्शी विचारों को
देखने के लिए
बड़े आवर्धन के
सूक्ष्मदर्शी की जरूरत होती है |
फिर कहा की मेरे लिए
अनंत त्रिज्या का एक वृत्त बना दो |
मैंने बात टालते हुए
पूछा कि-
आप यहाँ कैसे?
उस गुफा से ?
वह बोली अगर तुम
सोच रहे हो कि-
मैं उस धरातल
वाली बेबस बुढिया हूँ
तो तुम गलत
सोच रहे हो |
अच्छा तो मैं यहाँ
से जाऊ कैसे?
तुम जाना
चाहते हो?
हाँ |
और दोबारा आने का
वादा करके मैं चल दिया |
अबकी गुफा के द्वार
से निकला तो
सीधा तुम्हारे मन से
बाहर निकला |
अब तुम पूछती हो कि-
कहाँ रह गए थे तुम ?
तो मेरा जवाब यह है -
मुझे दो जिंदगियों
की मोहलत देदो
मुझे एक ज़िन्दगी उस
बच्ची के साथ
और एक उस बूढी औरत
के साथ बितानी है |
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