मैं जब भी विचारमुक्त अवस्था में रहना चाहता हूँ
नदी का एकांत किनारा ढूंढता हूँ
निश्चल जल को बड़ी उत्सुकता से निहारता हूँ
देखते ही देखते
बड़ी-बड़ी वृतीय तरंगे दिखाई पड़ती हैं
धीरे-धीरे उनका व्यास कम हुआ जाता है
और जब वो एक बिंदु पर मिलने को होती हैं
एक पत्थर उछलता हैं
और टकराता है मेरी स्मृतियों से
कई सवाल करता है
यह वही पत्थर है जिसे मैंने बरसों पहले गुस्से में फेंका था
यह सोचकर कि ‘वह’ भी
इस पत्थर की तरह ही
मेरी जिंदगी से निकल जाए तेजी से
और गहरे पानी में डूब जाए
और सब-कुछ शांत हो जाए एक बार
लेकिन हर बार पत्थर का अंतिम सवाल यही
कि------
‘तुम मुझे वापस लेने आए थे न यहाँ ?’


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