वह मेरे प्रेम को मेरी लिखी हुई पंक्तियों में ढूंढ रही थी
लेकिन प्रेम उन पंक्तियों के बीच उस रिक्त स्थान में हैं
जहाँ हमेशा ही कुछ नया लिखे जाने की गुंजाइश है
जहाँ लिखने की बहुत कोशिश भी होगी तो लिखे जाने के बाद भी
यही महसूस होगा कि उस खाली जगह में
जहाँ कुछ नहीं लिखा हुआ है
वो कुछ भी लिखे हुए से बेहतर होगा
लिखा हुआ हमेशा कमतर होगा
प्रेम वहीं है उस खाली स्थान में
क्योंकि वहां कुछ भी लिखा हो सकने की उम्मीद है
और कुछ भी पढ़े जाने की स्वतंत्रता है
यही रिक्त स्थान प्रेम है
यही उम्मीद प्रेम है
यही स्वतंत्रता प्रेम है |

वह मेरे प्रेम को मेरी ध्वनियों में सुनने की कोशिश कर रही थी
लेकिन प्रेम तो मौन में है
कुछ भी कहे जाने के अंतराल में है
उस हकलाहट में है
जब शब्द मुँह में ही दम तोड़ दिए थे
और उन मृत शब्दों के बीच घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा में है
उसी गुप्त ऊष्मा में
जिसमे लगता है कि ज्यादा कुछ नहीं है
लेकिन प्रेम उसी में है |
प्रच्छन्न है !


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