कभी-कभी
कुछ शुरू होने से पहले ही उसका अंत दिखने लगता है |
तब
मैं उस शुरुआत के थोड़ा आगे या पीछे से शुरू करता हूँ
जिससे
मैं उस प्रतीत होते हुए अंत के आस-पास पहुँच सकूँ
उससे
पूछ सकूँ कि क्या करने से वो मेरी जीवन रेखा पर
पूर्ण
विराम बनकर नहीं आएगा लेकिन-
वह
प्रतीत होता हुआ अंत कहीं दिखता ही नहीं
आस-पास
कहीं, कहीं दूर भी नहीं,दूर तक कहीं नहीं
प्रतीत
होता हुआ अंत कहीं भ्रम तो नहीं था?
या
कि यह भ्रम है की वह दिखता नहीं इतना निकट आकर
अब
यहाँ से देखने से यह भ्रम होता है कि जहाँ से वह
प्रतीत
होता हुआ अंत दिखा था वह वहीँ से दिखा था
या
कि उसके निकटतम कहीं से ?
उससे
निकटतम कुछ रहा भी हो तो उस
प्रतीत
होते हुए अंत के निकटतम यहाँ कुछ भी क्यों नहीं है ?
क्या
एक बूँद से जीवन का पुल टूट जाता है?
क्या
जीवन रेखा को कोई और रेखा प्रतिच्छेद करते हुए
उस
बिन्दुपथ को ही मोड़ कर साथ लिए जाती है?
जिससे
वह अपने पथ का अनुगमन नहीं कर पाता
क्या
इस नए रास्ते से केवल भटका जा सकता है?
क्या
उस निकटतम अंत तक भी नहीं पहुंचा जा सकता?
कभी
जब उस प्रतीत होते हुए अंत के निकटतम होकर भी
जब
शुरुआत तक पहुँचने की कोशिश भी करूँ तो
उसके
निकटतम कभी हो ही नहीं पाता !
फिर
ऐसे ही जीवन चक्र सतत चलता रहता है
मन
में आता है कि यह सब होने की प्रायिकता क्या थी?
यह
कंडीशनल प्रोबेबिलिटी है
कि
सारी घटनाएँ एक दूसरे से जुड़ी हैं
हर
एक बिंदु एक दुसरे से जुड़े हुए हैं
जिनसे
इस जीवन रेखा का अस्तित्व है |
केवल
रेखा को देखे तो एक पल के लिए बिंदु दिखते ही नहीं !
लेकिन
इन बिन्दुओं को जोड़कर देखें तो रेखा ही दिखती है |
फिर
ये बिंदु कहीं खो जाते हैं
इनमे
से यदि एक भी निकल जाए
तो
असंख्य रेखाओं को मौका मिलता है कि
वो
आएं और उस खोए हुए बिंदु की जगह से गुजर जाएँ |
अंत
को जितना ही करीब से देखा जाए
उस
अंत और निकटतम बिंदु से देखे जाने के बीच
असंख्य
बिंदु अस्तित्व में होते हैं |
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