जब मेरे ही विचारों की चोट मेरे मन पर हो लम्बवत
तब मन का स्वरुप बदल जाता
वो विचार मन के पदार्थ को किसी भी दिशा में छिटकने नहीं देता
इसलिए कोई भी विचार मन को छूने नहीं लगने चाहिए
लगे की जैसे विरोधी का हमला हो
समझना यूँ की किसी षड़यंत्र का हल हो
हल भी लगे की कोई प्रश्न हो
प्रश्न के भी सही या गलत होने की पड़ताल हो
और वो प्रश्न कोई अंतिम प्रश्न न हो
हर उत्तर एक नए और विकसित प्रश्न की तरह हो
और तब तक जब तक सब ये समझ न जाये कि

यह एक अनंत प्रक्रिया है |

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