मन के किसी अज्ञात कोने में पड़े हैं 
अभी भी तुम्हारे कुछ अवशेष 
जो मेरी नई इमारतों की 
नींव बन जाते है अक्सर 
और जब इमारतें ढहती है 
नही पता चल पाता मुझे 
नींव बहुत कमजोर थी या 
बहुत ज्यादा मजबूत |

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