मेरी माँ का सबसे पहला
दोस्त और दुश्मन
घर का चूल्हा था
जैसा मेरी माँ बताती हैं

वो घर की सबसे बड़ी लड़की थी
इसलिए सबसे कम उम्र में
सबसे बड़ी हो गयी थी
उधर जैसे ही उसके भाई-बहन
खाना खाना चिल्लाते
वो चूल्हे में आग बढ़ाती जाती
कभी उनकी भूख से डरकर
तो कभी किसी बड़े की डाँट से डरकर

ऐसे में उसकी भूख के लिए
उसके पेट में कोई जगह नही थी
वो बताती है कि अक्सर
खाना बनाने और खिलाने में
वो स्कूल के लिए लेट
हो जाया करती थी
और कभी कभार नही भी जा पाती थी

जैसे-जैसे चूल्हा जलता रहा
घर का बड़ा लड़का पढ़ता रहा
चूल्हे में वो खपती रही
बड़ा भाई बढ़ता रहा

एक दिन जब वो जरूरत भर बड़ी हो गयी
उसका चूल्हा किसी और घर चला गया
और जब बड़ा भाई जरूरत भर बड़ा हुआ
उसका चूल्हा सरकारी कॉलेज की मेस
में चला गया ।

उस चूल्हे की बस एक बात अलग थी कि
उसकी आग बढ़ाने वाला एक मर्द था और
उसमे बहन की मजदूरी और मजबूरी का स्वाद नही था
सुनते हैं जब घर के चिराग की लौ मद्धम पड़ने लगी
तब हॉस्टल के कमरे में एक एलपीजी वाला चूल्हा आया

जब पहली बार माँ का चूल्हा बदला
तब भी बहुत कुछ बदला
चूल्हा इस बार मिट्टी का ही था
लेकिन बहुत बड़ा था
उस पर बड़े-बड़े बर्तन रखे जा सकते थे
जितना बड़ा चूल्हा
उतनी ज़्यादा आग
और अब बड़ों की डाँट का डर
गुस्से में बदलता गया

इस बार माँ का घर बदला
जब वो शहर आयी
तो मिट्टी का चूल्हा स्टोव में बदल गया
जब हमारे घर एलपीजी सिलेंडर आया
मामा के घर गैस पाइपलाइन आ चुकी थी

मामा की कहानियों में किसी चूल्हे का जिक्र न था
उनकी कहानियाँ स्कूल से शुरू होती कॉलेज जाती
और देश के एक प्रसिद्ध परमाणु अनुसंधान केंद्र पर खत्म होती।

कोई भी परिवार परमाणु जैसा ही होता है
जहाँ घर के मर्द उस परमाणु के नाभिक में होते हैं
और स्त्रियाँ इलेक्ट्रॉन की भाँति उनके इर्द गिर्द
घूमती रहती हैं।

एक दिन किसी रिश्तेदार के घर जब मैं उनके पुराने एल्बम पलट रहा था मैंने अपने मामा को उसमे बड़ा होते हुए देखा
अलग अलग वक़्त की फ़ोटो
बचपन की कभी स्कूल ड्रेस में या
कभी किसी नए कपड़े में
जवान होते हुए कॉलेज के वक़्त की
जब मैंने पूछा माँ तुम्हारी फ़ोटो क्यों न थी उस एल्बम में
मेरी माँ ने बताया कि जब गाँव में कैमरे वाला एकलौता रिश्तेदार फ़ोटो खींचने आता था तब
अक्सर वो चूल्हे के सामने होती थी और इस तरह-

मेरी माँ को बड़ा होते सबसे करीब से चूल्हे ने ही देखा है।
और वो मिट्टी के चूल्हे
मेरी माँ के ज़ेहन में दफ़्न हैं।

माँ की ज्यादातर कहानियों में मामा का ज़िक्र होता है
लेकिन मामा की किसी कहानी में माँ का ज़िक्र नही होता
इसलिए उनके बच्चों और हमारे बीच
कहने-सुनने को कोई कहानी नही है।

उसकी बातों से मुझे हमेशा लगा कि
जब चूल्हा बड़ा हो गया
उसका शरीर और गल गया
खैर...
इसी कोरिलेशन पर दुनिया चल रही है
घर बनाने वाले को उसमे रहने को कहाँ ही मिलता है
घर की लड़कियाँ आखिर मजदूर ही तो हैं
बँधुआ मजदूर
जिनकी दिनभर की मजदूरी
रात के चूल्हे में फूँक दी जाती है।

माँ बताती है कि कक्षा पाँचवी के बोर्ड इम्तेहान में
वो सात गाँव की टॉपर थी
उस साल के गणित के पेपर में आये एक सवाल का
वो हमेशा जिक्र करती है जिसमे पूछा गया था कि
एक लट्ठे का अगर एक बटा चार भाग कीचड़ में
एक बटा चार भाग पानी में है तो कितना भाग पानी के ऊपर होगा ।
खैर उस वक़्त की गणित ने उसे एक बटा दो के जवाब ने टॉपर बनाया पर आज के वक़्त की गणित के हिसाब से उसका जवाब रहता है-
घर के बड़े मर्द
और उसका ये जवाब उसे आज का टॉपर बनाता है।


आज के दिन जब मैं अपनी माँ के बारे में सोच रहा हूँ,मेरे ज़ेहन में उनकी यही तस्वीर बन पा रही है।

-प्रशान्त

Comments

  1. जहाँ घर के मर्द उस परमाणु के नाभिक में होते हैं
    और स्त्रियाँ इलेक्ट्रॉन की भाँति उनके इर्द गिर्द
    घूमती रहती हैं।

    your words strike through

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