मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा पूँजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक लंबी लड़ाई का अभिन्न हिस्सा है।
जातिवादी समाज में alienation कोई नयी बात नही है । डॉक्टर अम्बेडकर अपनी थीसिस कास्ट इन इंडिया में कास्ट को एनक्लोस्ड क्लास के रूप में देखते हैं और वो ये भी बताते हैं कि इस समाज में विचारों का आदान-प्रदान सहजता से नही हो पाता जिसे वो 'lack of Social Endosmosis' का नाम देते हैं ।
जातियाँ नदी में द्वीप जैसी होती हैं जिनको जोड़ने वाले पानी में समुद्र की लहरों जितना दम नही होता और ये द्वीप आइसोलेशन में एक दूसरे से अलग थलग पड़े होते हैं ऐसे में एक देश की संकल्पना कागज़ी हो जाती है जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नही होता यही कारण है कि डॉक्टर अम्बेडकर ने जाति को एन्टी नेशनल कहा है। ये ताज्जुब की बात नही है कि डोमिनेटिंग कास्ट अपने विरोधियों को एन्टी नेशनल कहकर अपने कारनामों को छुपाता जा रहा है जो सही मायने में एन्टी नेशनल हैं।
एक बहुजन पुरुष होने के नाते अपनी सोशल लोकेशन के अनुसार अगर मैं कहूँ कि जाति मेरे अकेलेपन की एक सबसे बड़ी वजह है तो ये कहना कोई अतिश्योक्ति नही होगी। जातिवादी समाज में जहाँ हर तरह की ग्रुपिंग्स में जाति एक बड़ा फैक्टर होता है वहाँ हमें इस तरह का अलगाव महसूस करना कोई अनोखी बात नही है ।
मेरे हिसाब से हमारे समाज में हमारी सारी गतिविधियों में जाति किसी न किसी रूप में शामिल होती ही है इसलिए अगर मैं जाति की functioning को अपने शब्दों में कहूँ तो
जाति एक मैसिव बॉडी की तरह एक्ट करती है और सोशल फैब्रिक में distortions क्रिएट करती है । यह हमें बताती है कि हम समाज में कैसे मूव करें और कैसे बेंड हों। कुल मिलाकर यही distortions हमारी सोशल मोबिलिटी को तय करते हैं। जाति हमारे enormous पोटेंशियल पर लिमिट सेट कर देती है। ये विचारों,मूल्यों और ज्ञान के फ्लो को अवरुद्ध कर हमारा अमानवीकरण कर देती है । ऐसी Graded inequality के रोग से ग्रस्त समाज को representation जैसे फर्स्ट एड की तत्काल आवश्यकता है ।
डोमिनेंट आइडियोलॉजी पूरी तरह से ब्राह्मणवादी है उसका अपना एस्थेटिक सेंस होता है अगर आपका एस्थेटिक सेंस उसके एस्थेटिक सेंस से ओवरलैप नही होता तो आपका सोशल बॉयकाट हो जाता है। आधुनिक समय में जातिवाद के ज़हर को जो पहले के बजाए अब और ज्यादा काम्प्लेक्स और इनविजिबल रूप में बदल चुका है,जिसे ब्राह्मणवादी जातिवाद के खत्म हो जाने के दावे करते हैं, हर दिन इस अलगाव के साथ हमें जीना पड़ता है । बात बात में Casteist Slurs का उपयोग कभी disgust में तो कभी मजाक के सेंस में किया जाता है लेकिन हमारे लिए हर्टफुल होता है और विरोध करने पर गैसलाइट किया जाता है और इस तरह हम धीरे-धीरे किनारे कर दिए जाते हैं ऐसे में अगर हमारा कोई सपोर्ट ग्रुप एक्सिस्ट न करे तो समस्या बढ़ती चली जाती है । जब हम अपने सोशल लोकेशन के हिसाब से ऑर्गनाइस्ड होने लगते हैं महज़ इसलिए कि हम ऐसे टॉक्सिक माहौल में सर्वाइव कर सकें इतने भर में हमारे ऊपर जातिवादी होंने का आरोप लगने लगता है। ऐसे आरोप रियलिटी इन्वर्जन के घिसे पिटे उदाहरण के अलावा कुछ नही है।
देश के संविधान में Article 51A (h) के अनुसार साइंटिफिक टेम्पर को बढ़ावा देना हर नागरिक का मूलभूत कर्तव्य है। इसका अपना एक महत्व है । वैज्ञानिक चेतना समाज को जोड़े रखने के लिए एक ग्लू की तरह भी काम करती है । ऐसे समाज की तरक्की को कोई नही रोक सकता जिस समाज के नागरिक वैज्ञानिक चेतना से लैश हों।
कुछ लोग समाज को जोड़े रखने में ऑर्गनाइस्ड रिलिजन को इस बात के लिए क्रेडिट देते हैं लेकिन वैज्ञानिक चेतना विकसित करने से अच्छा विकल्प और कुछ हो ही नही सकता इतिहास ने ऐसा सिद्ध कर दिया है। राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में मजहब ही है सिखाता आपस में बैर रखना ।
हमें अपने क्लास-कास्ट एनिमी के बारे में बहुत अच्छे से पता होना चाहिए क्योंकि उन्हें हमारे बारे में हमसे ज्यादा पता होता है उनकी सोशल लोकेशन ऐसी है कि वो हमसे ज्यादा आर्गनाइज्ड हैं वो अपनी सारी गतिविधियाँ हमारे एक्शन्स के अकॉर्डिंग करते हैं ।
ब्राह्मणवादी समाज में जेंडर का सवाल जाति के सवाल से जुड़ा हुआ है जहाँ महिलाओं की सेक्सुअलिटी कंट्रोल करके सो कॉल्ड 'रक्त की शुद्धता' को मेन्टेन रखा जाता है।
ऐसे समाज में जहाँ सभी को इंडोगैमी ही एकमात्र विकल्प दिखता है, अपनी चॉइस जैसी बातों का कोई महत्व नही रह जाता और जिस समाज में आप अपने पार्टनर का चुनाव नही कर सकते,जहाँ किसी के साथ रहने का मसला व्यक्तिगत न होकर सामाजिक हो जाए ऐसे में लोग सामाजिक दबाव में अपनी इच्छा के विरुद्ध जब एक दूसरे के साथ रहने लगें तो अपनी इच्छाओं को दमन स्वरूप लोगों का लम्बे समय के लिए मानसिक स्वास्थ्य खराब हो जाना स्वाभाविक है ।
अपनी इच्छा के विरुद्ध लिये गए जीवन के महत्वपूर्ण व व्यक्तिगत फैसले का एक पहलू और है । जिस समाज का संविधान एक बालिग नागरिक को अपने पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह करने की इज़ाज़त देता है लेकिन समाज ये इज़ाज़त नही देता तो हम समझ सकते हैं कि ऐसे समाज की कलेक्टिव conciousness में कितना constitutionalism है।
एक नागरिक जब अपने जीवन के इतने बड़े फैसले अपने हिसाब से नही ले सकता तो वह अपनी individuality को कैसे acknowledge करेगा और जब अपने सेल्फ को ही ackowledge नही कर पाएगा तो healthy boundries मेन्टेन कर पाना तो दूर boundries बना ही नही पाएगा।
बड़े फैसले छोड़िये हमारे समाज में तो रोज़मर्रा के छोटे छोटे फैसले भी एक एडल्ट नही कर पाता मसलन दोस्ती किससे करनी है किससे नही,खाना क्या है, किस दिन क्या नही खाना है अगर ये सब भी हमारी परम्परा और परिवार का मुखिया ही तय करता फिरेगा तो सेल्फ डिपेंडेंट नागरिक का निर्माण क्या खाक होगा?
ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज में नॉन male की स्थिति किसी से छुपी हुई नही है उन्हें अपने जेंडर विशेष के कारण उत्पीड़न सहना पड़ता है । यह उत्पीड़न शारीरिक, मानसिक या अन्य किसी भी प्रकार का हो सकता है । ऐसे समाज में abusive relationships बहुत rampant है जिसका मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। सोशल मीडिया पर स्टॉकर से लेकर ज़िन्दगी में किसी टॉक्सिक लड़के की एक तरफा चाहत के फलस्वरूप मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है ये समझना कोई रॉकेट साइंस नही है।
हमें खुद को,परिवार को,समाज को डेमोक्रेटिक बनाना है। सामाजिक संस्थाओं को एक डेमोक्रेटिक स्पेस बनाना है ऐसे में representation अपरिहार्य है। हमें अपने इर्द गिर्द हर तरह के लोगों की मौजूदगी सुनिश्चित करनी है जिससे हमारे अंदर सेंस ऑफ belonging और सेंस ऑफ association की भावना विकसित होती रहे । हमें समाज के एक्टिव एलिमेंट के रूप में खुद को ढालना है न कि पैसिव एलिमेंट के रूप में जहाँ हम एक दूसरे से continueous जुड़ाव महसूस कर सकें और सोशल करंट के बहने में बाधा पैदा न करें क्योंकि एक रुका हुआ समाज एक सड़ा हुआ समाज होता है जहाँ मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पर बात करने की कोई गुंजाइश नही होती।
समाज में हर वर्ग की समस्याओं का एक वर्गीय स्वरूप होता है इसलिए व्यक्ति की सोशल लोकेशन बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है । ऐसे में यदि आप किसी की समस्या को भलीभाँति समझना चाहते हैं तो उसकी सोशल लोकेशन की समझ बहुत ही अच्छी होनी चाहिए । ऐसा न होने पर फ्री association जैसी बातों का कोई मतलब नही है।
उत्पादन की पूँजीवादी पद्धति भी लोगों में alienation पैदा करती है जहाँ इन्सान अपनी ही गतिविधियों या कार्यकलापों से कट जाता है । जहाँ खुद के द्वारा सृजित किये गए सामानों और सेवाओं पर उसका कोई हक नही होता। कार्ल मार्क्स ने ऐसे चार तरह के alienation का जिक्र किया है जिसमे इंसान अपने बनाए हुए प्रोडक्ट से,उत्पादन की प्रक्रिया से,स्पीशीज एसेंस और अपने साथियों से alienation महसूस करता है ।
उत्पादन की पूँजीवादी पद्धति में जहाँ सारा उत्पादन बाज़ार के लिए होता है ऐसे में किसी कमोडिटी की use value का
उसकी नज़र में कोई मतलब नही होता मतलब होता है तो बस एक्सचेंज वैल्यू का । ऐसे में हमारा कंसर्न ये होना चाहिए कि ये व्यवस्था मेन्टल हेल्थ से जुड़े हुए विज्ञान को जो एक ऐसी कमोडिटी बन चुकी है कि जिसकी purchasing power है वही उसका उपयोग कर पा रहा है । हमे इस मुद्दे को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ले जाना है । लोगों में इन मुद्दों के हर पहलू को लेकर जागरूकता का प्रचार करना है ताकि लोग इस मुद्दे को मूलभूत अधिकारों से जोड़ कर देख सकें। हम चाहते हैं विज्ञान सभी के लिए समान अवसर प्रदान करे क्योंकि ज्ञान पर किसी का व्यक्तिगत अधिकार नही होता। ज्ञान सामाजिक होता है क्योंकि ज्ञान समाज के कलेक्टिव लेबर से उपजता है। यह स्टेट की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हर मुद्दे पर वह अपने नागरिकों को जागरूक कर और निःशुल्क उन्हें हर तरह की सुविधा प्रदान करे । हम नागरिकों का यह कर्तव्य है कि हम स्टेट पर इसके लिए उचित दबाव बनाएँ। पर्सनल कैपेसिटी में लोगों को जागरूक करने की अपनी सीमाएँ हैं इसलिए किसी भी मुद्दे का efficient तरीके से प्रचार करने में कलेक्टिव रोल को acknowledge करना ही दूरदर्शिता है और यह तभी सम्भव हो पाएगा जब मेहनतकश जनता उत्पीड़न की इस पूँजीवादी व्यवस्था को समूल रूप से नष्ट करके समाजवाद की स्थापना कर लेगी।
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