मानसिक स्वास्थ्य और हमारा समाज 


हम सभी का कोई न कोई जीवन दर्शन होता है । हमारे ब्राह्मणवादी समाज के मूल में विचारवाद है । विचारवाद conciousness को highest फॉर्म ऑफ मैटर न मानकर उसे immaterial और primary मानता है जिसकी मैटेरियल वर्ल्ड से अलग एक इंडिपेंडेंट सत्ता है और इसी को आधार बनाकर तरह तरह के रहस्यवाद डोमिनेंट क्लास के द्वारा खड़े किए जाते हैं । जिससे कम से कम होता यह है कि इस मैटेरियल वर्ल्ड की किसी भी समस्या को देखने समझने का एक effective नज़रिया हमारे पास नही होता । ऐसा दर्शन हमेशा गलत सवाल खड़े करता है और उनके सही जवाब ढूंढने की नामुमकिन कोशिश में लोगों को खपा देता है ।
माइंड और बॉडी की बाइनरी जिसमे माइंड की सत्ता मानने वाले मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को किस तरह से लेते हैं यह जानना बहुत आवश्यक है । उदाहरण के तौर पर यदि किसी का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है तो जरूर स्ट्रेस एक कारण हो सकता है लेकिन हमारा समाज स्ट्रेस को किस तरह perceive करता है यह रोचक है सबसे पहले इस तथ्य को सिरे से नकार दिया जाता है क्योंकि स्ट्रेस मैनेजमेंट क्या बला है इसकी वैज्ञानिकता का बोध ऐसे समाज को नही होता है। तुरंत कह दिया जाता है कि इतना स्ट्रेस न लिया करो। उनके लिए यह मानना कि आसपास के माहौल में कुछ गड़बड़ी है,परिवार के माहौल में कुछ गड़बड़ है और यही सबकुछ हमारे भीतर कैसे रिफ्लेक्ट हो रहा है लगभग असंभव है और इन दो बातों में कोई लिंक नही देखते । ज्यादा से ज्यादा यह देखा जा सकता है कि हममें ही कोई कमी हो गयी है या हमारा अपने मन पर कंट्रोल नही है । मेरा मानना है कि जब तक हम समस्या को इस तरह से देखेंगे हम समस्या हल तो दूर समस्या को बढ़ा जरूर देंगे।
कुल मिलाकर मन को affect करने वाले variable हमे नही पता लेकिन हमारा दावा है कि हम उसे सफलतापूर्वक बदल देंगे यह बात मुझे समझदारी की तो नही लगती बल्कि एक नशे में धुत इन्सान के ज़िद जैसी जरूर लगती है ।

हमारा समाज किसी भी तरह के विज्ञान और वैज्ञानिक अध्ययन को वेस्टर्न का टैग लगाकर नकार देने की सनक में रहता है । ऐसे समाज का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हुई समस्याएँ आधुनिकता की देन है और यह आधुनिकता उन पर जबरन लाद दी गयी है अन्यथा हम तो वेदों की ओर लौट जाना चाहते हैं। हम कलियुग में नही रहना चाहते हैं । यह समाज ही escapist है इसीलिए यह अपने सुनहरे अतीत की कपोल कल्पनाएँ करता है। यह समाज विज्ञान और आधुनिकता की देन सभी तरह के मशीनी उपकरणों का उपभोग भी करेगा उससे सुविधाएँ भी लेगा लेकिन हमेशा बीते हुए कल की रट लगाता रहेगा। मेरा मानना है कि यह डोमिनेंट क्लास-कास्ट्स का कलेक्टिव गिल्ट है कि समय के साथ हम विकास क्यों नही कर पाए और हम arrow ऑफ टाइम का डायरेक्शन बदल देने की अवैज्ञानिक और अनैतिहासिक बातों का अम्बार लगा रहें हैं।
अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करके उन्हें बदलने के बजाए हम अपने अतीत का डंका पीटकर अपनी समस्याओं से मुँह फेर लेना चाहते हैं । पहले ऐसा न था पहले वैसा न था सबकुछ अच्छा था यह ब्रम्ह वाक्य ब्राह्मणवादी ही बोल सकते हैं।
ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे हमारे समाज के लिए एक कॉन्सपिरेसी की तरह हैं जिससे हमारा क्या लेना देना। मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे टैबू हैं लेकिन क्यों हैं हमें इस बात पर विचार करना है और ये विचार करते वक़्त हमें इस बात की तह तक जाना है ताकि इन मुद्दों के लिए हम एक उचित स्पेस बना सकें।
हमारे समाज में जब भी कोई आत्महत्या करता है हमारा spontaneous रिएक्शन क्या होता है ? यही की वो ऐसा कभी नही कर सकता आखिर इस conclusion तक हम किस तर्क प्रणाली से पहुँचते हैं ? हम जब इस तथ्य को ही नकार देंगे तो हम उसके पीछे के कारणों तक कैसे पहुँचेंगे ? हम कभी कैसे समझ पाएँगे कि ट्रॉमा क्या होता है? हम कभी कैसे समझ पाएँगे कि depression क्या होता है ?
जब आपका दर्शन माइंड को सुप्रीम पावर की हैसियत से देखेगा जिसको कोई प्रभावित नही कर सकता जिसका एक अलग वजूद है उसके होने से ये पूरा मैटेरियल वर्ल्ड है बजाए इसके की मैटेरियल वर्ल्ड है तभी कुछ है तब तक क्या हम कभी ये स्वीकार कर पाएँगे कि उस सुप्रीम पावर की भी अपनी समस्याएँ हो सकती है?
माता-पिता भगवान के रूप होते हैं ऐसा मानने वाला समाज यह कब मानेगा कि वो इन्सान होते हैं उनसे गलतियाँ हो सकती हैं उनकी परवरिश में खामियाँ हो सकती है खुद उनके बीच के संबंध में खामियाँ हो सकती हैं जिससे परिवार,घर उनके बच्चों के लिए एक unsafe स्पेस बन सकता है और खुद उनके लिए भी । क्या वो कभी इस तथ्य को स्वीकार कर पाएँगे?
क्या उनका जीवन दर्शन यह सब समझने में उनकी मदद करेगा या कि एक स्पष्ट समझ बनने में रोड़ा बन जाएगा इसकी पड़ताल करने का स्पेस क्या उनका दर्शन उन्हें कभी देगा?
हमारे समाज में जब कोई बात किसी के समझ में नही आती तो सामने वाला इंसान तुरंत कहता है कि ज्यादा philosophy मत झाड़ो इसका क्या मतलब निकलता है
यही कि फिलॉसफी सबकी समझ की चीज नही है ? क्या यह तथ्य अपने आप में metaphysical नही है ? क्या यही कारण नही है कि हमारा जीवन दर्शन हमारे जीवन और दर्शन को दो अलग चीजों की तरह देखता है जिसका आपस में कोई संबंध नही है?
ऐसा दर्शन हमें अपनी वस्तुगत परिस्थितियों का सही आकलन नही करने देता । हमें उन परिस्थितियों को समझने में कोई मदद नही करता जिससे हम अपने जीवन की समस्याओं को हल कर सकें बजाए इसके ऐसा दर्शन हमें वास्तविकता से दूर ले जाता है उसे नकारता है क्योंकि उसका हल उस दर्शन के पास है ही नही।
हमें ऐसा दर्शन चाहिए जिससे हम दुनिया को बदल सकें अपनी समस्यओं को सुलझा सकें,जो जैसा है उसे वैसा समझ सकें और किसी भी तरह के रहस्यवाद से बच सकें।
ऐसा दर्शन जो बदलाव को एक मात्र सत्य माने । जो कार्य कारण के संबंध को समझ सके। तभी हम मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को समझ सकेंगे और उसके उचित समाधान के लिए उचित दिशा में कदम बढ़ा सकेंगे।

ऐसा दर्शन यथास्थितिवादी होता है हमेशा स्टेटस quo मेन्टेन रखने वाला । वो किसी भी बदलाव को एकमात्र नियति मानने वाले दर्शन के विरोध में ही खड़ा रहेगा। हाँ यह जरूर है कि वो महत्वपूर्ण मुद्दों को अपने अनुसार एप्रोप्रियेट कर लेगा। उसकी अपनी तरह से व्याख्या करेगा और खुद ही एक समस्या बन जाएगा। ऐसे जीवन दर्शन को आदर्श मानने वाला समाज द्वंद्व को सुलझाना तो दूर उसको acknowledge भी नही करता । उदाहरण के तौर पर डिवॉर्स एक 'वेस्टर्न' मुद्दा है और 'वेस्टर्न' का मतलब एक सामाजिक बुराई । ऐसा समाज डिवॉर्स को इस तरह से नही देखता कि दो लोगों के बीच का कंट्राडिक्शन किसी कारणवश अब सुलझने की स्थिति में नही है एक डेडलॉक जैसी स्थिति है जहाँ साथ रहने का मतलब है लोगों का जीवन खराब होना ऐसे में अलग हो जाना ही उस कंट्राडिक्शन का रिसॉल्व होना है लेकिन ऐसे समाज का दर्शन बिल्कुल वैसा है जैसा कि जब हम चाँद को नही देख रहे होते हैं तो चाँद का अस्तित्व होता ही नही है । समस्या की तरफ से आँख मूँद लो तो समस्या है ही नही । ऐसा दर्शन अपने विरोधी आस्पेक्ट को assimilate कर लेना चाहता है वो यह नही समझता कि ऐसा करके वो अपने विकास को ही हमेशा के लिए अवरुद्ध कर लेता है ।

-प्रशांत सिंह 

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