एक वक़्त तक
मैं और मेरी दोस्त साथ खेलते थे
शायद कक्षा पांचवी तक
हम बहुत से खेल खेलते थे
कभी पकड़म-पकड़ाई
तो कभी बर्फ़-पानी
तो कभी एक्खट-दुक्खट
हमने अपनी गर्मी की छुट्टियों तक ये सारे खेल
रोज-रोज खेले
मोहल्ले के
और भी ढेर सारे दोस्त होते थे
जो हमारे साथ खेलते थे
एक जुलाई को हम कक्षा छः में चले गए
उसने अपना स्कूल नहीं बदला
पर मैं एक बालकों के विद्यालय चला गया
अचानक से सब बदल गया
मैं पीछे कहीं दुबका हुआ बैठा रहता
वहां लड़कों की भीड़ में
मैं अपनी दोस्त का चेहरा ढूंढने की
नाकाम कोशिशें करता
रोज-रोज
एक दिन मुझे एहसास हुआ
कि वो अब मुझे नहीं दिखेगी
हमारे बीच
हमारे साथ बिताए वक़्त के बारे में
सोचते हुए मैं अपनी साईकिल से
विद्यालय से लौट रहा था
अचानक सावन के बदल उमड़ आये
और तेज़ बारिश होने लगी
मैं अपनी यादों में इतना तल्लीन था
की मुझे होश न था कि
कब बारिश की बड़ी बड़ी बूंदें
मेरी आँखों के आंसुओं को
धोती हुई
उस कच्ची सड़क में समां गयीं
रेल की चीखती सीटी सुनकर
जब मेरी आंखें पूरी तरह से खुली
तब मैंने देखा की फाटक गिरा हुआ है
मैंने रेल का इंतज़ार भीगते भीगते किया
इंतज़ार जिसमे मैं बचपन से माहिर हूँ
मैंने किया
मैंने मन ही मन
आजके पढ़ाए हुए बीजगणित के पाठ
को दोहराया
जिसमे मैंने सीखा था की
सजातीय पद ही आपस में जुड़ते हैं
विजातीय पद नहीं
मुझे ये भी याद आया की विज्ञान की कक्षा में
मैंने कल ही सीखा था की
मिश्रण और यौगिक में क्या फर्क होता है
मैंने दोनों बातों में एक खास तरह की समानता अनुभव की
कि विजातीय पद मिश्रण बन जाते हैं
यदि वो एक खास अनुपात में न हों
दिमाग जो सुन्न पड़ा था
एकदम से खुल गया
मैंने देखा की फाटक भी खुल चुका था
और बारिश भी जा चुकी थी
मैं धीरे धीरे अपनी घर की तरफ
अपने साईकिल के पैडल
जिसपर मेरे पैर
बमुश्किल पहुँचते थे
तेज़ी से उनपर पैर मारते
चलता गया
मुझे पहली बार एहसास हुआ कि
अब मैं कभी भी उससे स्कूल में नहीं मिल सकता
मैंने सोचा तो क्या हुआ
साथ में पढ़ नहीं पाएंगे
लेकिन साथ खेलेंगे जरूर
पर पूरी जुलाई भर
वो मुझे नही दिखी
मैं बड़ी हिम्मत जुटाकर पहुँचा उसके घर
पता नहीं मुझे ये कैसे पता कि
उसके घर जाकर मुझे उसके मम्मी से
उसके बारे में नहीं
उसके भाई के बारे में पूछना है
मुझे उसकी मम्मी
'बड़ी मैडम' जैसी लगती थी
बड़ी मैडम हमारे स्कूल
की प्रिंसिपल थीं
एकदम भयावह
जिनको देखती ही
सारे तुर्रम खां
थर थर काँपने लगते थे
और जिनको उनका कंटाप
लग जाये तो
उनकी पैंट का रंग बदल कर
गाढ़ा हो जाता था
ऐसे में
मैं उन्हें देखकर
छिपने लगता
और उनके चले जाने के बाद
तक काँपता रहता
अजीबोगरीब मनःस्थिति रहती मेरी
उसके घर की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाते वक़्त
मेरी दोस्त से मिलने की गर्माहट और बड़ी मैडम का ठंडापन
मुझे अभी के तापमान पर ला देते थे
और अभी का तापमान मुझे कभी अच्छा नही लगता था
चाहे वो कुछ भी हो
मेरी दोस्त के बारे में ख़याल जो सुपरपोज़िशन में रहते थे
बड़ी मैडम के खयाल से उसका वेव-फंक्शन कोलैप्स हो जाता था
मैं अपनी आशाओं से मजबूर था
मैं इस फिराक में रहता
कि घर का गेट मेरी दोस्त खोलने आएगी
तो उससे पूछ लूँगा
कि क्यों नहीं आती अब वो
न ही खेलने
और न ही पार्क के सरकारी नल
'इंडिया मार्का' से पानी लेने
लेकिन अब वो गेट तक भी नही आती थी
उसकी माँ
जो मेरे लिए 'बड़ी मैडम' की तरह थी
गेट के दूर
अंदर से पूछतीं की कौन है
और मैं दूर से सुनकर ही भाग जाता
एक दिन उन्होंने मुझे पकड़ लिया
या यूँ कहूं कि उस दिन मैंने
कुछ हिम्मत दिखाई
और खड़ा रहा कुछ देर
गेट पर
वो आयीं और उन्होंने पूछा कि कौन है
मैंने अपना नाम बताया
उन्होंने नाम सुनने के पहले ही
मुझसे पूछा कि क्या काम है
मैंने बताया की मुझे उनके बेटे यानि
मेरी दोस्त के भाई से मिलना है
उन्होंने जैसे मेरी चोरी पकड़ ली हो
उन्होने झट से बोला की वो घर पर नही है
मैं सुन पा रहा था
अपनी दोस्त और उसके भाई की आवाज़ें
लेकिन मैं निराश होकर
उस दिन लौट गया
मैं उस दिन उससे कभी भी मिल पाने
की आशा को उसके गेट के बाहर
छोड़
खाली हाथ
वापस अपने किराये वाले घर में आ गया
और उस दिन के बाद से मेरा मन उस कॉलोनी में नही लगा
संयोगवश उस साल के खतम होते होते
मैं उस अजनबी सी जगह को छोड़कर
एक नयी अजनबी जगह
रहने एक नए किराये के घर में आ गया
बहुत सालों बाद
जब मैं इंजीनियरिंग करने आया
तब मैंने फेसबुक पर उसको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी
हमारी कुछ दिन थोड़ी थोड़ी बात भी हुई
मुझे लगा कि
मैं एक नए इंसान से बात कर रहा था
वो मेरी दोस्त नही थी
उसे हमारे बचपन की दोस्ती याद नही थी
उसे ये भी याद नहीं था कि हम कौन से खेल खेलते थे
उसे नहीं याद था कि कैसे अरोड़ा मैडम की मैं मिमिक्री करता था
और वो खूब हसती थी
उसे नही पता था कि मैं उसके गेट तक
आया था उसके बारे में पूछने
उसे नही याद था कि मैंने उसका एक साल तक इंतज़ार किया
उसी कॉलोनी में
उसी पार्क में
और मैं बस उसे याद दिलाता रहा
उससे उसके बारे में पूछता रहा
उसने कभी नही पूछा मेरे बारे में
और एक दिन मुझे एहसास हुआ
कि वो बड़ी मैडम जैसी बन गयी है
और मैं अभी भी उसका बचपन का दोस्त ही हूँ
और धीरे धीरे मैं
जेंटलमैन बनता गया
और अपना सारा बचपन
धीरे धीरे भूलता गया
इन अनुभवों ने मेरी परिकल्पना को
सिद्ध कर दिया कि
हम एक मिश्रण थे
जिन्हे आसान भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा
पृथक कर दिया जाता है
हम कभी यौगिक नही बन पाए
अच्छी दोस्ती एक यौगिक की तरह होती है
जिसमे 'मैं' की यात्रा 'हम' तक होती है
जहाँ दो लोग तीन बन जाते हैं
जिसमे सबसे ज्यादा महत्व उनके बीच के
सम्बन्ध का होता है
वो सम्बन्ध
हमें एक बिलकुल नया इंसान बनाता है...
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