खेतों
का पानी खेल के मैदानों में बहाया जा रहा है
सूखे
खेतों में पड़ रही है दरार
उन्ही
दरारों से मेरे कई भाइयों, बहनों का खून
सींच
रहा है पृथ्वी के गर्भ को
उनका
खून,पसीना जब जा मिलता है प्रकृति से
तो
होता है सृजन
इस
तथ्य को साजिशन रहस्य में बदल दिया गया है
अब
जब इन हरे भरे मैदानों से उपजता है मनोरंजन
तो
खेतों में उपजे अन्न से अपेक्षाकृत कई गुना बढ़ा देता है
तुम्हारा
मुनाफा
देश
में बेरोज़गारी और किसानों की आत्महत्याएँ
वर्ग
विभाजित समाज में थोपी गयी है
डेमोक्रेसी
(बुर्जुआ डेमोक्रेसी)
ऐसे
देश के धर्मग्रन्थ कहते हैं
क्या
लेकर आये थे क्या लेकर जाओगे
कर्मणि
एव अधिकार: ते
इस
‘ते’ में वे शामिल नहीं हैं
ऐसे
समाज में मैक्रोइकॉनॉमिक्स की सनक
बहुत
तीव्र हो जाती है
अंध-राष्ट्रवाद
वशीभूत कर लेता है
खेल
का मैदान जंग का मैदान बन जाता है
युद्ध
से पेट भरने लगता है
और
जब मरता है कोई तो समझ में नहीं आता कि
युद्ध
से मरा या भूख से ?
यह
प्रश्न ही भ्रामक है
उसकी
भूख ने युद्ध को जन्म दिया
और
भूख ने ही उसे मारा
पर
सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है कि
एक
सच्चा देशभक्त एक देशद्रोही को मारते हुए शहीद हो गया
कहानी
यहाँ ही नहीं रुकती
कुछ
सिरफिरे कैमरे के सामने
लोगों
की लाशों पर
नाचना
शुरू कर देते हैं
और
हमारे भोले भाले लोगों के बीच
चर्चा
के एक नया विषय जन्म लेता है
नाच
मनोरंजक था कि नहीं ?
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