अकेलापन 
किसी दिन यूँही अचानक 
एक अतिथि की तरह 
दरवाजे पर 
दस्तक नही देता 

वह आता है दबे पाँव 
धीरे-धीरे 
पानी की तरह 
पहले वो मन के दरवाजे से कोशिश करता है 
सभ्य तरीके से 
मनमाना स्वागत न होने पर 
दीवारों से सेंध मारता है 
जब इससे भी काम नही चलता 
वो निचली सतह तक जाता है 
और जमीन तोड़कर 
रिसता हुआ 
सभी ओर फ़ैल जाता है |

फिर इंतज़ार रह जाता है 
पानी की सतह और मन की छत के मिल जाने का 
जिसमे पूरी ताकत से तैरते रहने का 
बहुत ज्यादा मतलब नही दिखाई देता |

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