मेरे अपने लोग कौन हैं ?

कहाँ हैं अपने लोग

घर में ?

पड़ोस में ?

दक्खिन टोला में ?

किसी दूसरे शहर में ?

किसी दूसरे राज्य में ?

या किसी दूसरे देश में ?

या कि किसी दूसरे ग्रह में ?

 

मैं जब अकेलापन अनुभव करता हूँ

तो प्राकृतिक विज्ञान की शरण लेता हूँ

वो पढ़ते हुए मुझे मेरे होने का एहसास होता है

जीवन मुझे अर्थहीन नहीं लगता

गणित के चर, अचर, मुझे अपने लगते हैं

ग्रैविटेशनल कांस्टेंट, प्लांक कांस्टेंट जैसे

सार्वभौमिक स्थिरांक मुझे मेरे अपने घनिष्ठ मित्र लगते हैं

 

न्यूटन, आइंस्टीन, क्यूरी, हॉकिंग, नैश, रामानुजन

नोएदर, श्रोडिंगर, सगन, टेरेंस, रिमान, ओइलर

और जाने कितने घनिष्ठ

जिनसे मैं मिलता हूँ रोज़

जिनसे मैं बात कर पाता हूँ

वो मुझसे कभी नहीं कहते

की तुमने फला कैसे सोच लिया

फला कैसे लिख दिया

तुम मेरे जैसे नही सोचते तो देशद्रोही हो

मुझसे सहमति नहीं रखते तो देशद्रोही हो

तार्किक बात करो तो वो मुझे बड़बोला नही कहते

किताबों में मन लगाने पर मुझसे ये नही कहते कि

इतना पढ़ कर क्या उखाड़ लिया

क्या कमा लिया

औकात क्या है तुम्हारी?

वो मुझे कभी बुरा नही कहते

कभी गाली नही देते

कभी नीचा नही दिखाते

बात की तार्किकता पर वो मुझे जज करते हैं

मेरे गलत या अतार्किक होने पर

मुझे सलाह देते हैं

छोटी उम्र की ताकीद नहीं करते

ही कभी जाति पूछते हैं

ही कभी भाषा के आधार पर कभी कुछ कहा

 

और दूसरी तरफ मेरे मन के बाहर की दुनिया में

मेरे रिश्तेदार मुझे भाव नहीं देते

क्योंकि मैंने इंजीनियरिंग करने के बाद दूसरा विषय पढ़ना चुना

मैंने चुना खुदको

खुद की संतुष्टि को

मेरे गाँव वाले मुझे जानते हैं ही पहचानते हैं

वो मुझे मेरे दादा के नाम से जानते हैं और बहुत से लोग

दादा के सौतेले किंतु कमाऊ भाई के नाम से

जिन्हे कभी कभार मेरा नाम और मेरा काम दोनों ही याद नहीं रहता

मेरे वर्कप्लेस पर लोग मुझे अदृश्य वस्तु की तरह से देखते हैं

और जैसे ही उन्हें मुझसे कोई मीनियल काम होता है

तब मैं अदृश्य नही रह जाता

तब भी उन्हें मैं नहीं दिखता 

उन्हें दिखता है एक मशीन का पुर्जा

जो ब्रह्मा का पैर है

जो हमेशा धूल में रहता है

जिसका मस्तक ब्रह्मा के मस्तक से भी ऊँचा हो जाए

तो भी उन्हें बैठने तक की इज़ाज़त नहीं है

उनका बस इतना है की हम लेटे रहें

और जब अंग अकड़ने लग जाये तो

ज्यादा से ज्यादा बस बैठ जाएं

उनके पाँव की छाओं में

कभी भी भूल कर भी तन के खड़े हो जाएं

जिससे उनका कद मेरे कद से छोटा हो जाये

और मैं उनकी बनायी व्यवस्था को

उनके सामने ध्वस्त करके

उनके ईश्वर को ही ध्वस्त कर दूँ

और इंकार कर दूँ

उनकी ईश्वरीय सत्ता

उनकी सत्ता

और खींच कर ले आऊं उन सबको

स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर

एक ऐसे समाज में

मेरे मन के समाज में

जहाँ हम सब मानव हैं

जहाँ सबको एक दूसरे की आँखों में देखकर

बात करने इज़ाज़त है

जहाँ तर्क की सत्ता है

जहाँ एक दूसरे के प्रति इज़्ज़त है |

 

 

 

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