यह
केवल रंगों का त्यौहार नहीं है
यह
केवल प्यार साझा करने का त्यौहार भी नहीं है
यह
केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी नहीं है
पर
यह तो तय है कि इस अच्छाई-बुराई की हार-जीत में
होलिका
जरूर जली या जलाई गयी होगी |
इतिहास
में ये एकलौती घटना नहीं है
न
जाने कितनी विधवाओं को बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए सती होना पड़ा था |
आज
भी जब ‘बुरा न मानो होली है’ के नारे के साथ
यौन
कुंठित समाज महिलाओं को ही शिकार बनाता है
रंगों
की आड़ में उनके बदन को नोचा जाता है |
हाँ,बेशक
यह त्यौहार है
पर
एक खास वर्ग का
इस
समाज में सबकुछ है पर एक खास वर्ग के लिए
जो
आम वर्ग के शोषण से उपजता है
एक
खास वर्ग की सेवा में |
बचपन
में मैंने यह रंगों का खेल कभी नहीं खेला
इसका
कोई स्पष्ट कारण नहीं था मेरे पास
पर
अब भी जब मैं यह रंगों का खेल नहीं खेलता
इस
खेल को मैं देखता जरूर हूँ
और
मुझे यह पता है कि यह खेल खेलने के लिए
खिलाड़ी
और खिलौने दोनों की आवश्यकता होती है
कई
खिलाड़ी एक साथ खिलौने पर टूट पड़ते हैं
खिलौना
बाहर से टूटा हुआ भले न दिखे
वह
अन्दर से टूट जाता है |
अगले
ही दिन यह खिलौना अलसुबह रसोईघर में पाया जाता है
शाम
तक रसोईघर में लज़ीज़ पकवान बनाता रहता है
पकवान
बनाने वाले को पकवान जितनी इज्ज़त भी नहीं मिलती
यह
केवल होली की कथा नहीं है
यह
हमारे समाज में प्रतिदिन की कथा है |
अब
जब मैंने इस खेल का हिस्सा न बनने की ठान ली है
मैं
उस आम वर्ग से आग्रह करता हूँ कि खिलौना बनने से इंकार करदें और मेरे साथ नारा
लगायें
‘बुरा
ही मानो क्योंकि ‘होली’ है |’
Badhiya … keep up… jeete raho
ReplyDeletedhanyawad
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