हमें माफ़ करना मार्क्स
हमारे पास खोने के लिए हमेशा से कुछ न कुछ है
इस जन्म में न सही, अगले जन्मों में
हम वह सब एक बार फिर से कतई खोना नहीं चाहेंगे

ब्रम्हसत्य जगन्मिथ्या में अगर तुम्हारा भरोसा होता
तुम हमारा एक जीवन सुधारने की चाह में
हमारे शेष जन्मों में होने वाले शोषण से हमें बचा लेते
तुम में बेशक दूरदर्शिता का अभाव था |

‘इतिहासबोध’ की बात तो तुम हमसे करना मत
हमारा ‘वेद’ काल से परे है
कालचक्र का जाल तुम नहीं समझ सकते
कितना भी टहल लो या टहला लो
घूमफिर कर वही पहुँचना है जहाँ से चले थे
क्या तुम्हे ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी
में ‘वेद’ नहीं मिली पढने को ?
या तुमने चालाकीवश उसे पढना जरूरी नहीं समझा ?

काश तुम्हे पता होता कि ‘वेद’ पढने मात्र से
ज्ञान की प्राप्ति असंभव है
बस उसमे ‘विश्वास’ होना चाहिए |
‘वेदों’ में विश्वास करने से
उसमे अन्तर्निहित सारा ज्ञान
आत्मसात हो जाता है
पढने से नहीं |

तुम्हे विज्ञान की समझ थी ही नहीं
काश तुमने ‘इन्क्रिप्शन की’ और ‘डीक्रिप्शन की’
जैसे शब्द ही सुने होते !
तब तुम्हे पता चलता
यह ‘विश्वास’ ही ‘डीक्रिप्शन की’ है
सारे ज्ञान को ग्रहण करने के लिए
तुमको क्या पता कि
‘एक्सिस्टेंशिअल एक्स्पेरियंस’ क्या होता है |

कभी वक़्त मिले तो आना धरती पर
और कहीं नहीं ‘अखंड भारत’ में
तब हम तुम्हे समझाएँगे कि
हाकिंग जिसे ‘सिंगुलारिटी’ कहता है
असल में वही ‘ब्रम्ह’ है
और सारे ‘वेदों’ को ‘इवेंट होराइजन’ पर
मूर्त रूप दिया गया |

खैर तुमको अगर इतना समझ में
आ ही गया होता तो
तुम इतना बकवास नहीं करते
तुमने उसी दिन मौन व्रत धारण कर लिया होता
और तुम ‘कैलाश पर्वत’ की खोज में निकल गए होते |


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