वह
अपनी क्रांति को क्रांति कहता है
शेष
प्रतिक्रांति में आ जाता है
ऐसे
हैं हमारे क्रांतिवीर
माथे
पर हर मंगलवार तिलक लगाये
वह
कहता है देश की प्रगति उसके हाथों में हैं
सभी
की लड़ाईयां वह लड़ना चाहता है
यकीनन
वह निस्वार्थ भाव से सेवा करता है |
किसकी
सेवा करता है ?
यह
हनुमान चालीसा के बैकग्राउंड में
साइलेंट
रह जाता है |
वह
बातें बहुत तार्किक करता है
वह
मानता है सुमेरु पर तुम सब खड़े हो
मैंने
यह सब छोड़ दिया तो तुम सब तबाह हो जाओगे |
वह
यह सब खुद के लिए कभी नही करता
उसका
निस्वार्थ भाव बड़ा ही तार्किक है |
लोग
समझते ही नहीं इतनी तार्किकता
खामखाँ
निष्ठा पर आंच आ जाती है |
वह
फिर ध्यान दिलाता है
तुम्हे
मेरी जरूरत है
सब
केवल ‘जरूरत’ सुन पाते हैं
तुम्हे
मेरी या मुझे तुम्हारी के मायाजाल में
सब
फस जाते हैं |
शंकराचार्य
ठहाका लगाते हैं और कहते हैं
ब्रम्ह्सत्य
जगन्मिथ्या
क्रांतिवीर
इदन्नमम् का जाप शुरू कर देते हैं
क्रांति
क्रांति का नाम लेते हुए
प्रतिक्रांति
हो जाती है
‘पूँजीवाद
हो बर्बाद’ का नारा लगता है
ब्राम्हणवाद
आबाद होता रहता है |
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