जीते हैं हम कुछ ऐसे ,जैसे ज़िन्दगी
अपनी है .....पर अपनी नहीं
संघर्ष करते हैं
संघर्ष करने के लिए
शायद
ज़िन्दगी होती है
भाजक की तरह
जहाँ पर केवल अभाज्य ही -
हमेशा शेष छोड़ते हैं
दीमक खाता है
खाता रहता है
बचता है कभी शेष
कभी शून्य कभी शेष
कुछ लोग
बस कुछ ही
छू जातें हैं
अनंत्स्पर्शी की तरह-

---प्रशांत सिंह

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