मेरे मंतव्यों से ही होती है
मेरी टक्कर............जब
मन खदर जाता है
बहक जाता है

मै तिरस्कृत सा महसूस करता हूँ
नजरे झुकाकर
मै जम जाता हूँ
मै मौन
सब मौन जान पड़ते हैं
पदचाप सुनता हूँ

फिर जब जिंदगी चल पड़ती है
जीवन रेखा पर ऋणात्मक वृद्धि का
एहसास होता है
कुछ खोया लगता है
सूना सा लगता है
और फिर ........

कल्पनाओ का झुण्ड जब घेरता है
हजारो बीजगणितीय समीकरण एक साथ
गुजरते है मन से
एकदम मल्टीवेरिएबल से समीकरण
जिनके हल भी बहुआयामी है
मुझे कुछ पल के लिए ही सही
पर....रोक देते है
आराम देते है

फिर चल पड़ता है
स्पष्टीकरण का दौर
जहाँ मुझ पर बाण गिरते हैं
मैं छलनी हो जाता हूँ ,तब...
बचता है बस.....
खोखलापन

------Prashant singh

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