सुनो शहजादों !
राजकुमारों!
विलासिता छोड़ो
संकुचित बनो
पर....
मन से नहीं अपनी बेहद नाजायज जरूरतों से
ये मत भूलो
कि.....
वे भी इनसान हैं,मनुष्य हैं,प्राणी हैं,
अरे सजीव हैं
फिर भी तुमने उन्हें मार दिया
इतना इतराओ मत
आज वक़्त की लगाम तुम्हारे पास है
न जाने कल......
क्योंकि ....वक़्त बड़ा ही जालिम है
किसी का पक्ष नहीं लेता
परिचय-पहचान नहीं जानता
किसी के हाथों बिकता नहीं
फिर भी उससे इतनी उम्मीद !
कुछ भी करो
सोच और समझ से अमीर बनो
कागज़ के चंद टुकड़ों से नहीं


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