जन्म लेते ही शुरू होती है जहां ,
दोहरी ज़िंदगी ,
जिसमे एक को कहते हैं
ज़िंदगी और एक को -ख़ूनी संघर्ष
जहां होती रहती हैं
गलाकाट प्रतियोगिताएँ
जहाँ कोई जीतता है
या कोई हारता है
और इसी जीत-हार के खेल में
ख़त्म होती है ज़िंदगी
तब बचता है
केवल एक- स्वनिर्मित
लोहे का आदमी
जो न कभी हारेगा
न कभी मरेगा
अपनी हर झूठी जीत से
अपने इंजन में
इंधन का संचार करेगा और
जो इस अधमरे को चलाता है
निर्जीवों का समूह
जिसे हम कहते हैं
मशीनी-समाज 


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