जीवन के अनंत
संघर्ष में
हम फसते जाते
है किसी चक्रव्यूह में
मानो
इस कदर ....
आ जाते है
अहिरावन की जड़ में
तब भी रह जाते
हैं
अनभिज्ञ,लाचार
और बेबस
और करते रहते
है
निरंतर
नरसंहार.....
कभी
अनजाने तो कभी जान-बूझकर
पर समय आने पर
.....
खुद भी बन
जाते हैं
इस अनोखी
व्यवस्था का शिकार
फिर जान पड़ता
है,कि...
शिकार और
शिकारी
अलग नहीं होते
वो तो एक ही
थे
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