अब काल-बोध नहीं होता
बस तारीखे बदलती हैं
जैसे,
एक सांस के बाद दूसरी सांस लेता है कोई
क्रमशः .....
फैल गयी है जिंदगी
किसी तरल पदार्थ की तरह
कितना भी काछो...
शर्तिया,
कुछ न कुछ छूट जाएगा
और वह कुछ न कुछ और बाकी बचा हुआ
समान रूप से प्रभावित होंगे
पर कोई पूछे तो -कि तरल पदार्थ क्या चाहता है?
बस...
अब वो बहना चाहता है
एक ही उम्मीद लिए कि
कोई उसे काछे नहीं
क्योंकि-
अब वो दिग्भ्रमित होना चाहता है
अंततः वह चाहता है
कि-
न चल पाए किसी का जोर
सब कुछ होता जाये
बेतरतीब

----प्रशांत सिंह

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