रात सुबह को ढक लेती है
घोर तिमिर में बिजलियाँ कड़कती सुनाई देतीं हैं
अँधेरे में ज़िंदगी सिकुड़ सी जाती है
जब मजबूरी पेशा बन जाती है

मरिआना ट्रेंच सी गहराई महसूस होती है
मन की चंचलता शून्य हो जाती है
चेहरे का ओज भस्म हो जाता है
जब मजबूरी पेशा बन जाती है

रोटी से ज्यादा चोटें खानी पड़तीं हैं
हर एक वक़्त का खाना लकी ड्रा से निकलता है
खून जला कर उर्जा लेनी पड़ती है
जब मजबूरी पेशा बन जाती है

रेडियोएक्टिव विघटन होने लगता है
शरीर एक बोझ लगने लगता है
शीशे में अपना प्रतिबिम्ब डराने लगता है
जब मजबूरी पेशा बन जाती है

हारे हुए खेल को भी पूरा करना पड़ता है
आत्म विश्वास गन्दा मजाक बन जाता है
हक की भीख मांगनी पड़ती है
जब मजबूरी पेशा बन जाती है

हर ढंग,ढोंग लगने लगता है
ज़िंदगी मजबूरी का पर्याय बन जाती है
कमबख्त..........ज़िंदगी
जीने ही नहीं देती

जब मजबूरी पेशा बन जाती है

Comments

Popular Posts